टीकमगढ़ की धातु-कला में अंतिम आकृति को बाहर निकालने के लिए उसका मिट्टी का साँचा तोड़ना पड़ता है। यह लॉस्ट-वैक्स ढलाई है। मूर्ति या सजावटी वस्तु बनाने की शुरुआत धातु से पहले मोम में होती है, जहां कारीगर आकार और छोटे डिजाइन तय करता है।
मध्यप्रदेश पर्यटन के दस्तावेज के मुताबिक मॉडलिंग के लिए मोम, मूंगफली का तेल और बांधने वाली राल का मिश्रण तैयार किया जाता है। बड़ी वस्तु के लिए मिट्टी का आधार बनाकर उस पर मोम की परत चढ़ाई जाती है। कारीगर बारीक काम के लिए अपने बनाए औजार भी इस्तेमाल करते हैं।
मोम की जगह धातु कैसे पहुंचती है
तैयार मॉडल को मिट्टी के मिश्रण से ढका जाता है और एक रास्ता खुला रखा जाता है। गर्म करने पर मोम पिघलकर निकलता है। Incredible India के प्रक्रिया विवरण के अनुसार उसी खाली आकार में पिघली धातु डाली जाती है। ठंडा होकर जमने के बाद बाहरी मिट्टी हटती है और ढली हुई कृति सामने आती है।
इस विधि में छोटी रेखा का काम भी शुरुआत के मॉडल से जुड़ा होता है। इसलिए केवल तैयार कृति की चमक देखने से पूरी मेहनत का अंदाजा नहीं मिलता। आकृति गढ़ना, उसे मिट्टी में बंद करना और ढलाई के बाद बाहर निकालना अलग-अलग चरण हैं।
मध्यप्रदेश पर्यटन खिलौने, पशु आकृतियां, देव प्रतिमाएं और दीपक इस शिल्प के उत्पादों में गिनाता है। Craft Revival Trust के अभिलेख में धातु-कला का संबंध विवाह और पूजा की वस्तुओं से भी जुड़ता है। काम का उपयोग बदलता रहा है; मॉडल और साँचे की तैयारी उसके निर्माण के केंद्र में रहती है।
स्रोत और संदर्भ
- मध्यप्रदेश पर्यटन · Tikamgarh - The Quintessential Bell Metal Craft ↗11 मई 2020
- भारत सरकार, पर्यटन मंत्रालय · Bell Metal Ware of Datia and Tikamgarh ↗प्रकाशन-तिथि उपलब्ध नहीं
- Craft Revival Trust, India InCH · Lost Wax Metal Casting/Dhokra of Tikamgarh, Madhya Pradesh ↗प्रकाशन-तिथि उपलब्ध नहीं
सार्वजनिक प्राथमिक स्रोतों पर आधारित संपादित लेख। स्रोत जाँच: 15 सितंबर 2026।


