झाबुआ की एक तैयार गुड़िया में कई छोटे काम छिपे रहते हैं। कपड़े का शरीर, रुई की भराई, पैरों का सहारा और चेहरे के भाव अलग-अलग चरणों में बनते हैं। भील और भिलाला पहनावे के कपड़े तथा गहने जुड़ने पर आकृति को उसकी पहचान मिलती है।
IDC, IIT Bombay के D’source अभिलेख में रमेश परमार और शांति परमार के साथ काम करने वाली महिलाओं का दस्तावेजीकरण है। उसमें दर्ज कार्यशाला का ढंग बताता है कि एक गुड़िया तैयार होने से पहले काम कई हाथों से गुजरता है। किसी चरण में भराई होती है, किसी में सिलाई और किसी में रंगाई।
गुड़िया खड़ी कैसे रहती है
प्रक्रिया में पहले कपड़े पर हाथ, पैर और धड़ के आकार बनाकर दो तहें सिली जाती हैं। इन्हें उलटकर रुई भरी जाती है। पैरों में धातु का तार लगाया जाता है और हिस्से मजबूत गांठों वाली सिलाई से जोड़े जाते हैं। नीचे बचा तार लकड़ी के आधार में फंसाकर पीछे से मोड़ा जाता है।
चेहरे का काम अलग है। मिट्टी से आकार और नैन-नक्श गढ़े जाते हैं, फिर पकाने और कपड़े की पतली परत चढ़ाने के बाद ब्रश से भाव बनाए जाते हैं। अभिलेखीय तस्वीर में आंख और भौंह की बारीक लकीरें दिखाई देती हैं।
हस्तशिल्प विभाग के विवरण में झाबुआ की गुड़ियों के साथ टोकरियां, वाद्ययंत्र, मनके और स्थानीय पहनावे जैसी चीजें दर्ज हैं। इनमें रोजमर्रा की जिंदगी के दृश्य आते हैं। तैयार गुड़िया देखते समय उसकी मुद्रा, कपड़े और हाथ में रखी वस्तु को साथ पढ़ने पर वह दृश्य साफ होता है।
स्रोत और संदर्भ
- D’source, IDC, IIT Bombay · Dolls of Jhabua: Process ↗प्रकाशन-तिथि उपलब्ध नहीं
- D’source, IDC, IIT Bombay · Dolls of Jhabua: People ↗प्रकाशन-तिथि उपलब्ध नहीं
- विकास आयुक्त हस्तशिल्प, भारत सरकार · Jhabua Adivasi dolls ↗प्रकाशन-तिथि उपलब्ध नहीं
- D’source, IDC, IIT Bombay · Dolls of Jhabua: Credits ↗प्रकाशन-तिथि उपलब्ध नहीं
सार्वजनिक प्राथमिक स्रोतों पर आधारित संपादित लेख। स्रोत जाँच: 15 सितंबर 2026।


